अंदर की बात::सह भोज के निहितार्थ –

बड़े भाई भोज तो भोज लेकिन लखनऊ के राजनैतिक गलियारों में विगत कुछ दिनों से एक ख़ास भोज की चर्चा बहुत जोरों पर है हालाँकि ऐसे भोज तो पहले भी कई बार हो चुके हैं परंतु इस बार के भोज को जो ओज दिया गया वैसा पहले के भोज अवसरों को कभी प्राप्त नहीं हुआ अब पहले हो चुके भोज अपनी प्रतिष्ठा पर मारे शरम के मरे जा रहे हैं और संभवतः गुहार लगा रहे हैं कि, हे मान्यवरों !
थोड़ी हमारे भी चर्चा कर लो क्या हुआ कि हम पुराने हो गए ।

लेकिन इधर देखिये –
हाल का भोज –
बड़े गर्व के साथ सीना तानें इठलाता हुआ यहाँ वहाँ पूरी मस्ती में –
बस्ती – बस्ती घूम रहा है कभी विपक्ष की गली तो कभी पक्ष की गली, कभी टी वी डिबेट कि ठाट तो कभी चौक- चौराहों की चाय पट्टी वाली खाट,
इनकी पूरी मौज है ।
मौसम भी मेहरबान है ।
चाय की चुस्कियों पर सजी राजनीतिक धुरंधरों की महफ़िल में भी इसी सह भोज की चर्चा है ।
वाह खूब,
इस भोज की तो मौज ही मौज है ।
इस भोज में शामिल रहे लोगों की भी इधर काफ़ी पूछ बढ़ गई है, दूसरे दलों के महत्वपूर्ण लोग इन पर वेलेंटाइन बन
नैना-चार की कोशिश में गुलाब फेंक रहे है ।
इधर कुछ जैम्स बांड ब्रांडेड बिचारे रात दिन एक किये है की भोज में शामिल रहे तक़दीरी लोगों से कुछ उगलवा लिया जाए कि इस इस भोज के बहाने उस दिन क्या क्या विचारा गया ?
परंतु उन्हें पसीना आ रहा है और कोई ओर- छोर पकड़ा नहीं रहा है ।
परिस्थिति बड़े रूप में यानी श्री कृष्ण कन्हैया के विराट ब्रम्हांड के दर्शन सरीखा रूप दरसन हो इससे पहले ही संबंधित राजनीतिक दल के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष को इस पर सख़्त ऐतराजिक टिप्पणी करते हुए भविष्य के लिए चेतावनी जारी करनी पड़ गई।
लेकिन इतना तो तय है कि, यह भोज कोई न कोई दीर्घकालिक प्रभाव डालने पर विवश कर गया है ।
राजनीतिक आकाओं को दलीय प्रतिबद्धता के साथ जातीय संरचना के प्रभावी होने का डर सताने लगा है ।
तो वहीं जाति विशेष के लोगों में अपनी अस्मिता एवं अहम के प्रति ज़िम्मेदारी की उनकी महत्वपूर्ण उपयोगिता प्रभावी दिखने लगी है।
हाशिये पर आ चुके जाति विशेष के लोगो के अंदर इस भोज ने इतना ओज भर दिया है कि बसपा के अंतिम शासन काल में उनकी निभाई भूमिका के किरदार पुनः अंगड़ाई लेने लगे है।
सवाल यह मचलने लगा है कि क्या कुछ गुल खिलेगा ?
कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आगामी चुनावों में यह सह भोज कुछ ऐसा प्रभाव डाल दे की कहानी के किरदार ही बदल जाय और फ़िल्मांकन को तैयार कहानी की पटकथा में फेरबदल करना पड़ जाए।
परंतु इस भोजन के अंदर के निहितार्थ तलाशने को तमाम गोते लगाने पर भी मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि अपनी जातिगत उपेक्षा की कसक इस सहभोज के दरम्यान चर्चा कर अपने अपने ग़म ग़लत करने की अभिलाषा लिए हुए
एक दूरगामी राजनीतिक परिणाम दे सकता है ।
बाक़ी तो बड़े भाई आपको क्या समझाना आप तो समझ ही गए होंगे कि अगर धुआँ दिखा है तो आग ज़रूर लगी होगी ।
उपेक्षा की पीड़ा गगरी से बाहर छलकने को है तो समझो चोट तो कहीं न कहीं लगी होगी।
मसला मसाले का यह है की डर चोट ठोकर की नहीं वरन् वोट छटकाने का है ।
दोपहर ढली होगी तो साँझ सजी होगी । Anil tiwari

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